बर्फ़ क्यों गिरती है?
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ये हिमपर्त षटकोणीय होते हैं और कोई भी दो गिरी हुई बर्फ कहीं बहुत हल्की तो कहीं बहुत गहरी भी हो सकती है। क्यों कि बर्फ़ हवा से उड़ती हुई इधर-उधर जाती है और एक जगह पर इकट्ठा हो जाती है। गिरती हुई बर्फ़ हमेशा नर्म नहीं होती। कभी कभी यह छोटे-छोटे पत्थरों के रूप में भी गिरती है। इन पत्थरों को ओले कहते हैं। इनमें बर्फ़ की कई सतहें होती हैं। अभी तक सबसे बड़ा ओला १.२ किलो का पाया गया है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ़ के पहाड़ हैं। इन पहाड़ों से बर्फ़ के बड़े बड़े टुकड़े अलग होकर तैरते हुए आगे बढ़ते हैं। इन टुकड़ों को हिमशिला कहते हैं। बर्फ़ पानी पर इसलिए तैरती है क्यों कि वह पानी से हल्की होती है। |
ये बादल जब ठंडी हवा से टकराते हैं तो इनमें रहने वाले वाष्प के कण पानी की बूँद बन जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कमरे की हवा में रहने वाली वाष्प फ्रिज से निकाले गए ठंडे के कैन से टकरा कर पानी की बूँद बन जाती है। एशिया में यूरोप की तरह बारहों महीने वर्षा नहीं होती। मानसूनी हवाएँ वर्षा ऋतु लाती हैं और इसके बाद सर्दी और गर्मी की ऋतुओं में वर्षा आमतौर पर बहुत ही कम होती है। गर्मी की ऋतु के बाद लोग वर्षा ऋतु की प्रतीक्षा करते हैं। अगर वर्षा न हो तो आकाल जब बहुत ज़्यादा वर्षा होती है तो नदियाँ अपने किनारों से बाहर आकर बहने लगती हैं और शहर में पानी भर जाता है। इसको बाढ़ कहते हैं। वर्षा का जल साफ़ और शुद्ध होता है। इसलिए यह शुद्ध जल का सबसे अच्छा स्रोत है। भारत के चेरापूँजी नगर में विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है। |
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